इनदिनों लगातार हो रहे मजदूरों के पलायन से समाज से लेकर सरकार तक चिंतित हैं।

मुंगेर जिला के संग्रामपुर से रोहित कुमार का रिपोर्ट

इन दिनों लगातार हो रहे मजदूरों के पलायन से समाज से लेकर सरकार तक चिंतित हैं। और सच में ये विषयचिन्तनीय भी है। क्योंकि लगातार मजदूरों के हो रहे पलायन से कई तरह के मुश्किलें सामने आने लगे हैं। किसानों के खेत के फसल बर्बाद हो रहा है। साथ किसी भी तरह के मजदूरी के लिए मजदूर मिल नहीं रहे हैं। शहर तो साफ हैं परंतु जहाँ से मजदूरों की टोली उठ कर शहर जाते है।

वहाँ दूर दूर तक सफाई का नामों निशान नहीं है। क्योंकि सरकार सिर्फ योजनाएं पारित करते हैं। और उस योजनाओं से जुड़े दो चार फोटो सेसन में सामिल होते हैं। सफाई तो मजदूर ही करते हैं। परंतु इन सभी असुविधाओं का दंश झेल रहे समाज, सरकार, एवं आला अधिकारीगण मूकदर्शक बनी हुई दिखाई दे रही हैं। बताते चलें कि केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) महज एक दिखावे मात्र रह गया हैं। ज्ञात हो कि शुरुआती दौर में इस योजनाओं से अच्छी खासी मजदूरों की भीड़ देखी गई। ग्रामीण क्षेत्रों में गुजर कर रहे मजदूर तबके के लोगों के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई थी। कारण था कि अब मजदूरों को प्रदेश जाने की जरूरत नहीं होगी। लोग इससे जुड़े अपना मजदूरी कार्ड भी बनवाया। और काम भी किये। परंतु धीरे धीरे इस योजनाओं से आने बाले काम अंतर्ध्यान होता चला गया। क्योंकि विभाग बढ़ा विभाग के साथ साथ विभागीय अधिकारी बढ़े। और अधिकारियों के साथ साथ अधिकारियों के तासिलदार भी बढ़े। परंतु जिस रफ्तार से विभाग की विस्तारिता हुआ उस हिसाब से  मजदूरों को काम देने में विभाग सक्षम नहीं हो पाई। ऐसा नहीं कि विभाग में या क्षेत्र में काम की कोई कमी हैं। काम भी है और विभाग में पैसे भी लेकिन योजनाओं को धरातल तक लाने में काफी मशक्कत के साथ साथ कई आला अधिकारियों के टेबल से होकर गुजरना पड़ता हैं। मुश्किलें यही खत्म नहीं होती जिस तरह से देश अभी महँगाईयों के दौर से गुजर रहा हैं। ऐसे में आमजन जीवन पे क्या प्रभाव पड़ रहा है। हमें नहीं लगता कि ये बातें बताने की जरूरत होगी। ईशान कुछ करें ना करें खाने के लिए रोटी दाल सब्जियों की जरूरत पड़ेगी ही चाहे वो ईशान रोजगार में हो या बेरोजगारी का दंश झेल रहा हो। जीने के लिए खाने की जरूरत होगी ही। और खाने के लिए कमाने की। ये तो प्रकृति का नियम हैं। और ये सत्य भी हैं। जिस योजनाओं का जिक्र यहाँ हो रहा हैं। इस योजनाओं का रफ्तार तो बढ़ता गया। परंतु जिस हिसाब से देश मंहगाई की ओर छलांग लगाई। उस हिसाब से मजदूरों को दिए जाने वाले नियुनतम मजदूरी दर जहाँ था वही रह गया। या यूं कहा जाय मजदूरी दर छलाँग लगाने में फिसड्डी साबित हुआ। जानकारी के लिए आपको बता दें कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में मजदूरों के मजदूरी 168 रुपये प्रति दिन के हिसाब से हैं। वही राजमिस्त्री के मजदूरी 250 रूपये प्रति दिन के हिसाब से दिया जाता हैं।

तो ऐसे में सवाल ये उठता हैं कि क्या आज के इस महँगाई के दौर में सरकार के तरफ से दिए जाने बाले मजदूरी से एक मजदूर या एक आमलोग जीवन गुजार सकते हैं। ये एक सोचनीय प्रश्न है। साथ ही लगातर हो रहे मजदूरों के पलायन उचित हैं। या अनुचित क्या सरकार सिर्फ वादे करते फिरेंगे या धरातल पर भी मजदूरों के हित मे कोई काम होगा। क्या इतने कम मजदूरी दर से मजदूर तबके के लोग मजदूरी कर पायेंगे। ये सारे सवाल लोगों के जेहन में बार बार उठता हैं। बाबजूद इसके ना तो इस बिषय पर सरकार गंभीर हैं। और ना ही विभागीय अधिकारी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WhatsApp chat