जहानाबाद समाहरणालय से उर्दू में लिखी गई नेम प्लेट हटा दी गई।  

 

 

 

बरुण कुमार:—

 

 

जहानाबाद मीर कारवां इन्साफ कमिटी के सचिव कॉमरेड तारिक फतेह की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित की गई। इन्होंने अफसोस जताया कि उर्दू बिहार की दूसरी सरकारी भाषा है। इसके बावजूद समाहरणालय में लगे उर्दू के नेमप्लेट को हटा दिया गया। इस से स्पष्ट होता है कि अधिकारियों की दृष्टि में उर्दू का कोई महत्व नहीं है। उन्होंने कहा कि जब मुझे अंजुमन-ए-तरकी उर्दू जहानाबाद का सचिव बनाया गया था तब उर्दू और हिंदी में नेम प्लेट पूरे जिले के सरकारी कार्यालयों में लगाई गई थी। प्रशासन के इस रवैये को देखकर यह प्रतीत होता है कि उर्दू ज़बान का कोई महत्व नही है। मखदुमपुर ब्लॉक के क़मरडीहा गाँव के पूर्व मुखिया आलमगीर अशरफ़ ख़ान उर्फ ​​लाला ख़ान ने कहा कि यह न केवल अफ़सोस की बात है बल्कि यह शर्म की बात है


कि अंजुमन-ए-तरक्क़ी उर्दू का अपना कार्यालय जहानाबाद शहर में है और इसके अध्यक्ष और सचिव जहानाबाद शहर में रहते हुए भी इसपर ध्यान नही देते हैं। खान रिजवान ने कहा कि इसके अलावा, उर्दू अकादमी के सदस्य भी शहर में रहते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संस्था का काम है उर्दू के प्रचार और प्रसार का फिर भी इनलोगों को इन बातों से कोई मतलब नही रहता है। उर्दू अकादमी के अधिकारियों की शिथिलता आश्चर्यजनक है ?

खान रिजवान ने कहा कि उर्दू के साथ इस तरह के दुर्व्यवहार और अन्याय की परंपरा को सहन नहीं किया जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लोग उर्दू के नाम पर रोटी खा रहे हैं। वह भी चुप हैं। उर्दू समुदाय के जानकार लोगों आक्रोश व्याप्त है। इस अवसर पर मासूम हैदर खान, रियाज खान, उस्मान खान, साबिर अहमद शाहीन तारिक, महबूब आलम खान, रुस्तम अंसारी, मंजर खान ने भी अपने अपने विचार व्यक्त किया।

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