जिले के चंदवा प्रखण्ड मुख्यालय से मात्र दस किमी दूरी पर रांची-चतरा मुख्य मार्ग से पश्चिम छोर पर स्थित मां उग्रतारा नगर मंदिर लगभग पांच हजार वर्ष पुराना माना जाता है। शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध मंदिर में कलश स्थापना के साथ 16 दिवसीय नवरात्र शुरू हो गया।

बाइट-अवधकिशोर पाठक नगर मंदिर पुजारीराहुल कुमार के साथ बद्री गुप्ता की ब्यरो रिपोर्ट

लातेहार/नगर मंदिर चकला गांव में निवास करने वाले हिन्दू-मुस्लिम सहित सभी जातियों की मंदिर से आस्था व श्रद्धा जुड़ी है। यहां परिवहन व रहने खाने व रात्रि विश्राम के लिए उपयुक्त व्यवस्था है। इस मंदिर में पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, दिल्ली, ्रराजस्थान, छतीसगढ़, चेन्नई, इत्यादि राज्यों से श्रद्धालु पूजा अर्चना व पिकनिक मनाने के लिउ सालों भर आते रहते है। मांतारा नगर मंदिर का संचालन चकला शही परिवार व मिश्र परिवार टुड़ामू संयुक्त रूप से करते हैं। विशेष रूप से यहां रामनवमी व दुर्गापूजा धूमधाम से मनाई जाती है। इस मंदिर में पूर्णिमा के दिन अपार भीड़ लगती है। दुर्गापूजा के दिन तो हजारों दशर्नार्थी यहां आते है। श्रद्धालुओं का मानना है

कि जो यहां सच्चे दिल से पूजन करते है उनकी मन्नतें अवश्य पूरी होती है।16 दिनों का मनाया जाता है दशहरा:इस मंदिर के लिए सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां दशहरा 16 दिनों का मनाया जाता है। पुजारी जी द्वारा बताया कि 16 दिवसीय नवरात्र पूजन के लिए परम्परा के तहत उन्हें दिन भर में दो बार भोग लगाना होता है। सुबह भगवती को भोग में शरबत व शाम को तीखूर के हलवे के साथ पेचकी को भूनने के बाद गुड़ में पका कर भोग लगाया जाता है। परम्परा के अनुसार 16 दिनों तक चाहे कोई भी विपत्ति क्यों न आ जाए उन्हें मंदिर छोड़ने की मनाही है।बताया जाता है कि मातृ नवमी से अमावस्या तक नित्य मां उग्रतारा के आरती के बाद कलश पूजन होगा। वही मातृनवमी को कलश स्थापना के बाद ही बकरे की बलि आरंभ कर दी जाती है। वह अष्टमी नवमी के संधि काल में कड़ा की बलि दी जाती है।कैसी है पूजा की परंपरा: भारत के अति प्राचीन मंदिरों में इस मंदिर के पुजारी अंदर के कमरे में खड़े होकर श्रद्धालुओं के प्रसाद का मां भगवती को भोग लगाकर देते है। श्रद्धालुओं को अंदर के कमरे में प्रवेश की मनाही होती है। यहां प्रसाद के रूप में मुख्य रूप से नारियल, मिश्री व मोहनभोग भी चढ़ाया जाता है। मोहनभोग नगर , मा उग्रतारा मंदिर का रसोइया ही बनाता है। मोहनभोग , आठा, गुड़ घी का बनता है। दोपहर के समय मां भगवती को पुजारी उठाकर रसोई में ले आते है। जहां भात, दाल और सब्जी का भोग लगता है। जिसे पुजारी स्वंय बनाते है।मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा बकरे की भी बलि दी जाती है। मंदिर में विधिवत दो बार आरती की जाती है। मंदिर के पश्चिमी भाग में स्थित मादागिर पर्वत पर मदार साहब का पांच हजार वर्ष पुराना है। बताया जाता है कि मदार साहब मां उग्रतारा भगवती के बहुत बड़े भक्त थे। तीन वर्षो में एक बार इनकी पूजा होती है। और काड़ा भैंस की बलि दी जाती है। उसी खाल से मां उग्रतारा मंदिर में आरती के लिए नगड़ा बनाया जाता है।

बताया जाता है कि जब कोई भक्त मन्नते मांगता है और उसकी मन्नते पुरी हो जाते है तो मंदिर परिसर में पांच झण्डे गाड़े जाते है व एक सफेद झण्डा मदार साहब के मजार पर गाड़ा जाता है।रहस्यों से भरा है पूरा क्षेत्र:मां भगवती के दक्षिणी व पश्चिमी कोने पर स्थित चुटुबाग नामक पर्वत पर मां भ्रामरी देवी गुफाएं है, जहां कई स्थानों पर बूंद बूंद पानी टपकता रहता है। 70 फीट नीचे सतयुगी केले के वृक्ष है,जो वर्षो पुराने होने के बावजूद आज भी जीवित है और फल देते है। वहां एक पत्थर में छेद है और उसमें तीव्र गति से पानी निकलता रहता है, मगर यह पानी सिर्फ केले के वृक्षों को ही प्राप्त होता है। शेष सभी स्थान सूखे रहते है। इस मंदिर में हजारों वर्ष पूर्व स्टेट के राजा द्वारा मिटटी की चहारदीवारी कराई गई थी । जिसमें सात दरवाजे हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह चाहरदीवारी आज भी मौजूद है। पहाड़ों और घने जंगलों के बीच स्थित इस मंदिर की शोभा अत्यंत निराली लगती है। हजारों वर्ष प्राचीन परंपरा आज भी है जीवंत: स्थानीय लोगों ने बातचीत के दौरान बताया कि प्राचीन समय में जिस प्रकार राज दरबार की व्यवस्था मां उग्रतारा नगर मंदिर में आज भी कायम है।*फिलवक्त मंदिर में पुजारी मिश्रा परिवार टुढ़ामू व पाठक परिवार नगर के सदस्य है।

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