नागार्जुन स्मृति पर्व समारोह के बहाने एक नव परिवर्तन का अहसास हुआ ।

घनश्याम झा

सत्ता एवं सत्ताधीशों के द्वारा मिथिला और मिथिला से जुड़े स्मृतियों और संस्कृतियों को भुलाने का प्रयास किया जा रहा है । विकास काना हो चुका है अर्थात् उसे सिर्फ एक विशेष क्षेत्र ही सूझ रहा है । सत्ता के शिखर पर बैठे मठाधीशों इतनी ऊँचाई पर अवस्थित हो गए है कि उन्हें मिथिला क्षेत्र का पिछड़ेपन नजर नही आता । चीनी मिल , जुट मिल , सुता मिल , पेपर मिल बंद है फलस्वरूप लोग पलायन को मजबूर है । ट्रेन में धक्के खाकर लोग तीन हजार किलोमीटर जाकर दिन रात पसीना बहाते है । क्या ये पसीना अपनी मिट्टी पर नहीं बहाया जा सकता है? हम दुसरे प्रदेशों की बंजर मिट्टी को अपनी मेहनत और पसीनों से सींचकर हरा भरा करते है और हमारी हरी भरी मिट्टी दिनों दिन बंजर होता जा रहा है । वर्षों से नौजवान सत्ता से कोई सवाल नही पुछ रहा था लेकिन हमने हजारों युवाओं में विकास की ललक देखी है । अविनास भारद्वाज और संतोष मिश्रा के ललकार को गौर से सुनना और उसपर जोरदार ताली बजाना ये सिद्ध करता है कि नौजवान अब विकास की बात करना चाहता है । मिथिला स्टूडेंट यूनियन मिथिला में विकल्प देने को तैयार है तो जनता भी इस विकल्प को स्वीकार करने को तैयार है । धन्यवाद शांति फाउंडेशन को जिनके माध्यम से ये सच जानने का मौका मिला कि नौजवान अब अपनी मैथिली और मिथिला के विकास के प्रति सजग होना चाहता है । बाबा नागार्जुन सदैव आमजनमानसों की आवाज बनकर रहे । लेकिन ये सत्ता पर बैठे तब के आमजनमानस ना तो जीवित में बाबा को सम्मान दे पाए और ना ही उनके स्वर्गवास के बाद । पंद्रह सालों से बाबा के नाम से प्रस्तावित एक प्रखंड अब तक फाईल में दबा है । बाबा को जिला स्तर पर एक श्रद्धांजलि भी नही दी जा रही है । सत्ता के मद में चूर सभी राजनितिक दल मिथिला के विभूतियों के नामों को मिट्टी पलीत करने पर तुली है । लेकिन अब वो समय आ गया है कि सत्ता में बैठे खद्दरधारी एवं कोट पैंट वाली उद्योगपतियों के सांठ गांठ को जनता के सामने रखकर उन्हें याद दिलाया जा सके कि इंदिरा गांधी को ललकारने वाले बाबा भले ही दुनिया में ना हो लेकिन उनका विचार अब भी जिंदा है । बाबा मैथिलों , किसानों और मजदूरों के दिल में जिंदा है ।

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