लोहागढ़ तट वासी स्व.मणि प्रसाद सिंह शतरंग के जादूगर थे:

निकेश कुमार सिंह

बांका: बिहार बंगाल उड़ीसा के महाराजा दरभंगा महाराजा के दरवार में कई रत्न थे जिनमें एक थे दरवारी लाल जिन्हें शतरंज के खेल में महारत हासिल था।और उनके नाम की तूती बोलती थी।शतरंज के खेल में चुनोती देने बाला तो क्या?खेलने तक का भी कोई साहस नही कर पाता था।दरभंगा महाराजा उससे बहुत प्रभावित रहते थे।एक दिन की बात है कि दरवारी लाल ने अपने महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह से जो दरभंगा राज के 19 वे राजा थे कि आज्ञा लेकर अभिसार को निकले।और उन्होंने मन में शपथ ठान ली थी कि जो भी यात्रा के क्रम में शतरंज के खिलाड़ी मिलेंगे।उसे मात देंगे।दरअसल बात यह थी कि शतरंज के खेल में उन्हें बादशाहत हासिल थी।यात्रा के क्रम में हथहुआ राज,सोनवर्षा राज,खड़गपुर राज,बनेली राज आदि के दरवार में दरवारी लाल पहुँचे और सभी कुशल शतरंज के कुशल योद्धा को परास्त किया।बात 1918 ई. की है जब दरवारी लाल शाहकुंड के रस्ते लक्ष्मीपुर स्टेट जा रहे थे तो उनकी मुलाकात यात्रा के क्रम में योगिंदर सिंह नामक एक युवक से हुई वह अपने कुछ दोस्तों के साथ बृक्ष के नीचे शतरंज खेल रहे थे।दरवारी लाल उन लोगो के बीच बैठकर शतरंज का आनन्द लेने लगे।योगिंदर सिंह ने यात्री से शतरंज खेलने का अनुरोध किया।योगिंदर सिंह पहली ही चाल में मात खा गये।तब दरवारी लाल ने अपनी सारी कहानी बताई।यह सुनकर श्री सिंह बहुत चकित हुए।तब श्री सिंह ने कहा कि यहाँ से 7 कोस की दुरी पर लोहागढ़ के तट पर पकरिया नामक गाँव है वहाँ एक-पर-एक शतरंज के खिलाड़ी हैं जिनका सानी नही है।दरवारी लाल योगिंदर सिंह के साथ पकरिया ग्राम पहुँच गये।पकरिया ग्राम में उनकी मुलाकात नागेश्वर सिंह से हुई उन्हें दरवारी लाल का आवभगत किया चारों और खबर आग की तरह फैल गयी कि दरभंगा महाराजा के दरवार के एक रत्न जिन्हें शतरंज के खेल में महारत हासिल है पधारे है,कुछ लोग तो बहुत खुश हुए कि पहले ही चाल में उन्हें हमीं मात दे देंगे।जब खेल का विसात पसरा तो एक पर एक धुरंधर चित हो गये।यह पहली घटना थी जब लोहागढ़ के तट पर आकर किसी प्रवासी ने शतरंज के खेल को चुनोती दी हो।जब शतरंज के सारे योद्धा चित हो गये तब 96 वर्षीय नबाब सिंह(जमादार सिंह के बाबा)ने कहा कि अभी सारे योद्धा चित नही हुए हैं।एक योद्धा है जो आप को मात दे सकता है।वो है सूर्य पुत्र मणि सिंह।उस समय मणि प्रसाद सिंह की उम्र महज 13 साल रही होगी।कद काठी में लंबे सुडौल,गोरे, आकर्षक एवं अनुशासन प्रिय तथा प्रतिभासम्पन्न दिखते थे।जब उनको सारी बात दरवारी लाल के बारे में नबाब साहब के द्वारा बतायी गयी तो उन्हें थोड़ा संकोच हुआ कि अपने से बड़ो के बीच बैठकर शतरंज की विसात कैसे बिछाएंगे।तब उनके पिताजी सूर्य नारायण सिंह ने कहा कि बेटा लोहागढ़ की धारा संकट में है और इस संकट से तुम्हीं उबार सकता है।फिर क्या था शतरंज का चौपड़ शुरू हुआ हजारों लोग इस खेल के वाजीगर को देखने एकत्रित हुए थे।जैसे ही शतरंज की चाल दरवारी लाल ने चली कि वो पहली ही चाल में मात खा गये इस प्रकार लोहागढ़ के तट पर पकरिया ग्राम में दरवारी लाल का अहंकार टुटा और उन्होंने मणि प्रसाद सिंह को मणि रत्न की उपाधि से विभुसित किया।आज स्व.मणि सिंह के प्रपौत्र ठाकुर रूद्र प्रताप सिंह एवं ठाकुर शान्तनु सिंह शतरंग के नव उभरते सितारे हैं।

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