श्रीकृष्णावतार.

 

निर्मल कुमार पांडेय

भगवान श्रीकृष्णनिर्मल कुमार पांडेय का स्वरूप, उनका जन्म, उनकी लीलाएँ–सब दिव्य हैं, अद्भुत हैं, अतर्क्य हैं।उस तत्त्व को वस्तुतः स्वयं श्रीकृष्ण ही जानते हैं अथवा यत्किंचित् उनके वे महाभाग्यवान् भक्त जानते हैं, जिनपर करुणा करके वे दयामय प्रभु स्वयं इन अति विचित्र रहस्यमय तत्त्वों को उनके हृदय में प्रकाशित कर दिये हैं।गीता में वे स्वयं कहते हैं–”न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः” तथा अर्जुन ने भी इसे अक्षरशः स्वीकारते हुए कहा है कि हे भगवन्!आपके लीलामय स्वरूप को न तो देवता जानते हैं,न दानव ही।आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं।

सचमुच, जिनकी पलकों के एक इशारे पर त्रिभुवन-विमोहिनी योगमाया अनन्तानन्त ब्रह्माण्डों के सर्गस्थितिसंहार रूप जगद्व्यापार-कार्य का नित्य निष्पादन कर रही है, जिनके संकेतमात्र से असंख्य-असंख्य लोकपाल और अन्य प्रधान देव अपनी-अपनी लीलाओं में निरन्तर निरत हैं, जिनकी असमोर्ध्वसुन्दर-मनोहर रूपमाधुरी एवं अनन्त-अनन्त आनन्दवर्षिणी लीलामाधुरी का भगवान् ब्रह्मा- शिव-संकर्षण- नारद-व्यास-वाल्मीकि- शुक-सनकादि सर्वदा सादर गुणगान करते रहते हैं,जिस आनन्दमहासिन्धु अचिन्त्य प्रेमस्वरूप परमात्मा का एक सुधासीकर सम्प्राप्त कर त्रिलोकी धन्य-धन्य हो रहा है,उन क्षरातीत, अक्षरोत्तम, पूर्णपुरुषोत्तम,समग्र ब्रह्म एवं सर्वगुह्यतम परमतत्त्व श्रीकृष्ण के स्वरूप तथा अवतरण के रहस्य को भला कौन इदमित्थं निरूपित कर सकता है?परस्परवरोधी धर्मों का इनमें अन्यतम प्रकाश है।ये निर्गुण होते हुए अचिन्त्यानन्त कल्याणमयगुणगणस्वरूप हैं, नित्य अकर्त्ता होते हुए सर्वकर्त्ता हैं,सर्वथा असंग होकर भी नित्य प्रेमपरवश हैं।नितरां निस्पृह होकर भी कर्म करते हैं, अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, कालरूप होकर भी शत्रु के डर से भागते हैं और द्वारका के किले में जाकर छिप रहते हैं, स्वात्माराम होकर भी सोलह हजार स्त्रियों के साथ रमण करते हैं–इन विचित्र चरित्रों को देखकर बड़े–बड़े बुद्धिमानों की बुद्धि चकरा जाती है।

भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के अनेक कारण होने पर भी उनके अवतार के प्रमुख तीन कारण गीता में निम्नप्रकारेण बताए गए हैं–

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

किन्तु, श्रीकृष्णावतार के उक्त तीनों प्रयोजनों में सर्वप्रमुख प्रयोजन ” साधुपरित्राण” ही है। दुष्टों का संहाररूप द्वितीय प्रयोजन भी इसी में अन्तर्भूत होता है और धर्मसंस्थापनरूप तृतीय प्रयोजन तो प्रभु के पधारते ही आप से आप सिद्ध होता है, उसके लिए प्रयत्नान्तर की अपेक्षा नहीं है।पर,जो साधुपुरुष अपने हृदयधन श्रीकृष्ण की एकमात्र दर्शन-लालसा से ही इस संसार में जीवनधारण किये हुए हैं, उनकी इस इकलौती लालसा की पूर्ति उनके सामने परमात्मा के सशरीर उपस्थित हुए बिना कैसे हो सकता है?

अस्तु, जब दर्शनलालसामात्रैकजीवी साधुपुरुषों केलिए प्रभु पधार ही गए तो उन्होंने “एकाक्रिया द्व्यर्थकरी बभूव “न्याय से साधुपुरुषों के अनिष्टों का निवारण सही समझते हुए तत्काल कर दियाऔर यही दुष्टविनाशरूप प्रयोजन सिद्ध हो गया।फिर शाश्वत धर्म के आश्रय रूप श्रीकृष्ण द्वारा दुष्टों के संहार और साधुपुरुषों के संरक्षणकार्य के क्रम में ही स्वतःधर्मसंस्थापन हो गया, क्योंकि धर्म की ग्लानि का कारण ही नहीं रहा।

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